12th August 2025
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जन्माष्टमी पर मटकी फोड़ की परंपरा भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी है। इसमें युवाओं की टीमें मिलकर ऊँचाई पर लटकी मटकी को तोड़ती हैं, जो साहस, टीमवर्क और उत्सव का प्रतीक है।
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"गोविंदा आला रे!" मटकी फोड़ सिर्फ खेल नहीं, भगवान कृष्ण की नटखट लीलाओं की याद है।
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मटकी फोड़ जन्माष्टमी का एक रोमांचक और लोकप्रिय आयोजन है। यह परंपरा भगवान कृष्ण के माखन चोरी की लीलाओं से जुड़ी है।
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बाल कृष्ण और उनके दोस्तों को माखन बहुत पसंद था। वे ऊँचाई पर रखी मटकी से माखन चुराने के लिए मिलकर पिरामिड बनाते थे।
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टीमवर्क और भाईचारे का प्रतीक, साहस और संतुलन की परीक्षा, भगवान के साथ जुड़ाव और भक्ति
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अब मटकी फोड़ का आयोजन महाराष्ट्र और भारत के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर होता है। टीमें "गोविंदा आला रे" के नारों के साथ मटकी फोड़ती हैं।
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मटकी फोड़ हमें सिखाता है कि एकता, मेहनत और उत्साह से हर ऊँचाई को छुआ जा सकता है।
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