उत्तराखंड राजधानी विवाद: उत्तराखंड, देवभूमि कहलाने वाली इस पवित्र धरती की पहचान सिर्फ हिमालय की वादियों, तीर्थस्थलों और प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है। यहाँ की असली पहचान है – जनता का संघर्ष।
सन 2000 में जब उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक नया राज्य बना, तब सबसे बड़ा सवाल यही था कि राजधानी कहाँ होनी चाहिए?
लोगों के मन में एक ही नाम था – गैरसैंण। पहाड़ के बीच बसा यह छोटा-सा कस्बा उत्तराखंड की आत्मा का प्रतीक था। लेकिन, सरकार ने राजधानी देहरादून बना दी।
आज 25 साल बाद भी वही सवाल गूंज रहा है – देहरादून क्यों? गैरसैंण क्यों नहीं? और अब जनता फिर आवाज़ बुलंद कर रही है, 21 सितंबर को दिल्ली के जंतर मंतर पर महानगर दिल्ली उत्तराखंड प्रवासी संगठन के लोग शांतिप्रिय धरना देकर। अगर आप लोग समझते है कि पहाड़ का विकास हो, पलायन पर रोक लगे और हमारा उत्तराखंड एक सशक्त राज्य एवं गैरसैंण स्थायी राजधानी बनें, तो आप सभी से आग्रह है कि आपके दोस्त रिश्तेदार जो भी दिल्ली/एनसीआर में रहते है उनको 21 सितंबर को इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन में सम्मिलित होने के लिए प्रोत्साहित करें।
तो आइए पहले जानते हैं कि कैसे बनी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून।
देहरादून कैसे बनी राजधानी?
जब 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, तो अंतरिम राजधानी के रूप में देहरादून चुनी गई। इसके पीछे सरकार के कई तर्क दिए गए –
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भौगोलिक सुविधा: देहरादून मैदानों में है, यहाँ सड़क और हवाई संपर्क बेहतर है।
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प्रशासनिक आधारभूत संरचना: देहरादून पहले से उत्तर प्रदेश का जिला मुख्यालय था, यहाँ प्रशासनिक सुविधाएँ और दफ्तर मौजूद थे।
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संसाधन और जनसंख्या: देहरादून में आबादी ज्यादा और संसाधन उपलब्ध थे, जिससे राजधानी चलाना आसान था।
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राजनीतिक दबाव: मैदानों की राजनीति हमेशा हावी रही है, नेताओं के लिए देहरादून रहना और दिल्ली से जुड़ना आसान था।
इन तर्कों के सहारे, देहरादून को पहले अंतरिम और फिर स्थायी राजधानी बना दिया गया।
गैरसैंण को क्यों नहीं बनने दिया राजधानी?
गैरसैंण, चमोली जिले में स्थित है। इसे राजधानी बनाने की सबसे बड़ी वजह थी –
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यह राज्य के बीचों-बीच स्थित है, जिससे पहाड़ और मैदान दोनों से पहुँच संभव है।
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यह पहाड़ की संस्कृति और पहचान का केंद्र है।
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आंदोलनकारियों ने 1990 के दशक से ही गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग की थी।
फिर भी इसे राजधानी क्यों नहीं बनाया गया? इसके पीछे कारण थे –
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राजनीतिक अनदेखी: मैदानों के नेताओं का दबदबा हमेशा ज्यादा रहा है। उन्हें देहरादून ही सुरक्षित लगा।
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आधारभूत संरचना की कमी: गैरसैंण में सड़क, बिजली, पानी और बड़े सरकारी दफ्तर बनाने में लागत ज्यादा थी।
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दिल्ली से दूरी: गैरसैंण दिल्ली से दूर है, जबकि देहरादून दिल्ली से सीधा जुड़ा है। नेताओं के लिए यह अहम कारण बना।
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आर्थिक स्वार्थ: देहरादून और आसपास के इलाकों में बिल्डरों, उद्योगपतियों और राजनेताओं के हित जुड़े हुए हैं। राजधानी वहीं बनी तो सबको फायदा हुआ।
यानी गैरसैंण को नज़रअंदाज़ करना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी।
जनता का सपना – गैरसैंण क्यों बनना चाहिए राजधानी?
आज भी लोग पूछते हैं – गैरसैंण ही क्यों? तो जवाब साफ है –
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भौगोलिक संतुलन
गैरसैंण पहाड़ के बीच स्थित है। राजधानी यहीं होगी तो पहाड़ी और मैदानी दोनों इलाकों में संतुलन रहेगा।
देहरादून को राजधानी बनाने से राज्य का झुकाव मैदानों की तरफ हो गया है और पहाड़ उपेक्षित रह गए हैं। -
पहाड़ का विकास
गैरसैंण राजधानी बनेगा तो सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों और रोजगार के अवसर पहाड़ तक पहुंचेंगे।
वरना आज भी पहाड़ खाली हो रहे हैं, गाँव उजड़ रहे हैं और पलायन लगातार बढ़ रहा है। -
आंदोलनकारियों का सपना
उत्तराखंड राज्य सिर्फ मैदानों की मांग पर नहीं, बल्कि पहाड़ के संघर्ष और शहादत पर बना था।
शहीदों का सपना था – राजधानी गैरसैंण बने, ताकि पहाड़ भी बराबरी से विकसित हों। -
पहचान और अस्मिता
गैरसैंण सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता है। इसे राजधानी बनाना पहाड़ की संस्कृति और पहचान को सम्मान देना है।
देहरादून की हकीकत
देहरादून को राजधानी बनाए जाने के 25 साल बाद आज क्या स्थिति है?
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पूरा विकास सिर्फ देहरादून और आसपास केंद्रित हो गया है।
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पहाड़ के गाँव खाली हो रहे हैं, लोग रोजगार की तलाश में मैदानों और दिल्ली-मुंबई पलायन कर रहे हैं।
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स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ अब भी पहाड़ों से कोसों दूर हैं।
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राजधानी के बोझ से देहरादून खुद भी बेहाल हो चुका है – ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और अनियोजित शहरीकरण की मार झेल रहा है।
गैरसैंण राजधानी आंदोलन – अबकी बार गंभीरता
पहले भी गैरसैंण के लिए आंदोलन हुए, लेकिन सरकारों ने वादे कर टाल दिया।
लेकिन अब स्थिति बदल रही है –
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युवाओं में गैरसैंण को लेकर नई चेतना है।
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दिल्ली के जंतर मंतर पर 21 सितंबर को होने वाला धरना सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि नई शुरुआत है।
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यह लड़ाई सिर्फ राजधानी की नहीं, बल्कि पहाड़ की अस्मिता और भविष्य की है।
हमारी जिम्मेदारी
आज सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि राजधानी कहाँ हो, बल्कि यह है कि क्या हम अपने शहीदों और आंदोलनकारियों के सपनों को पूरा करेंगे?
गैरसैंण को राजधानी बनाना सिर्फ एक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि यह जनता के सम्मान और विश्वास का मुद्दा है। क्योंकि सरकारें अक्सर वही कदम उठाती हैं, जिनसे उन्हें राजनीतिक या आर्थिक फायदा हो। लेकिन संस्कृति, सभ्यता और अस्मिता बचाने का जिम्मा हमेशा आम जनता पर ही आ जाता है। अगर हम चुप बैठे रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी कि कभी इन पहाड़ों पर बसते गाँव जीवन से भरे थे, यहाँ की संस्कृति जिंदा थी। सरकारें बदलती रहेंगी, उनके फैसले बदलते रहेंगे, लेकिन अगर जनता अपनी आवाज़ नहीं उठाएगी, तो हमारी विरासत धीरे-धीरे मिट जाएगी। यही वजह है कि अब वक्त आ गया है कि हम सब एकजुट होकर अपने पहाड़ों की आवाज़ बनें। गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी जड़ों और उस बलिदान का सवाल है, जिसकी नींव पर उत्तराखंड बना था।
- उत्तराखंड की राजधानी देहरादून बनाई गई, लेकिन इससे सिर्फ मैदानों का विकास हुआ।
- गैरसैंण को राजधानी बनाना ही सही मायनों में उत्तराखंड के गठन का उद्देश्य पूरा करेगा।
- आज जरूरत है कि हम सब एकजुट होकर इस मांग को बुलंद करें।
21 सितंबर को जंतर मंतर पर होने वाला धरना सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी का वादा है –
“गैरसैंण हमारी राजधानी बनेगी।”
वीडियो देखें:
