अल्लूरी सीताराम राजू को रक्षा मंत्री की श्रद्धांजलि, 128वीं जयंती पर स्मरण

रक्षा मंत्री ने अल्लूरी सीताराम राजू को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की।
भारत की स्वतंत्रता संग्राम के एक महान आदिवासी समर्थक सेनानी अल्लूरी सीताराम राजू को उनकी जयंती पर याद करते हुए केंद्रीय रक्षा मंत्री ने उनके त्याग, साहस और योगदान को नमन किया। रम्पा विद्रोह के नायक रहे राजू, आज भी आदिवासी अधिकारों और स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा हैं।
अल्लूरी सीताराम राजू के बारे में
- अल्लूरी सीताराम राजू आंध्र प्रदेश के एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
- उनका जन्म 4 जुलाई, 1897 को आंध्र प्रदेश में हुआ था तथा वह एक तेलुगु भाषी क्षत्रिय परिवार से थे।
- अपनी प्रारंभिक शिक्षा पैतृक गांव में ही पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए विशाखापत्तनम चले गए।
- उनकी बहादुरी और बलिदान के कारण स्थानीय लोगों द्वारा उन्हें वननायक (मान्यम वीरुडु) के रूप में सम्मानित किया।
- उनका लक्ष्य आदिवासी लोगों को आजाद कराना और अंग्रेजों को पूर्वी घाट से बाहर निकलना था।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
- असहयोग आंदोलन के दौरान सीताराम राजू ने स्थानीय पंचायतों में आपसी विवादों को सुलझाने और औपनिवेशिक अदालतों का बहिष्कार करने के लिए आदिवासियों को प्रेरित किया।
- उन्होंने आदिवासी समुदायों को ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ संगठित किया।
- आदिवासियों से औपनिवेशिक न्यायालयों की बजाय पंचायतों का उपयोग करने और ब्रिटिश प्रणालियों का बहिष्कार करने का आग्रह किया।
- उन्होंने आंध्र-ओडिशा सीमा के पूर्वी घाट के वन क्षेत्रों में गुरिल्ला अभियान का नेतृत्व किया तथा ब्रिटिश सरकार के दमनकारी वन कानूनों और नीतियों के खिलाफ जनजातीय लोगों को एकजुट किया।
रम्पा (मान्यम) विद्रोह (1922-1924)
- रम्पा विद्रोह जिसे मान्यम विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है, मद्रास प्रेसिडेंसी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण आदिवासी आंदोलन था।
- रम्पा प्रशासनिक क्षेत्र में लगभग 2800 जनजातियाँ रहती थी, जो खेती में पोंडु प्रणाली का प्रयोग करती थी पोंडु प्रतिवर्ष जंगलों को काटकर की जाने वाली खेती है।
- पोडू या जिसे झूम/स्थानांतरण कृषि भी कहते है जिसमें कृषि के लिए वन भूमि के कुछ हिस्सों को साफ किया जाता है तथा कुछ वर्षों के बाद दूसरे क्षेत्रों में पलायन करना शामिल था यह उनकी पारंपरिक और टिकाऊ जीवनशैली थी जो उनकी खाद्य सुरक्षा एवं सांस्कृतिक पहचान भी सुनिश्चित करती थी ।
- मद्रास वन अधिनियम, 1882 द्वारा प्रेरित, जिसने जनजातीय लोगों के आंदोलन पर प्रतिबंध लगा दिया इसके अलावा लघु वन उपज के संग्रह पर भी प्रतिबंध लगा दिया जिससे आदिवासी लोगों को वन विभाग या ठेकेदारों के लिए कम मजदूरी पर भी काम करने हेतु मजबूर होना पड़ा।
- अल्लूरी सीताराम राजू ने उनके लिए न्याय की मांग की और अंग्रेजों के विरुद्ध गुरिल्ला सेना बनाई तथा ब्रिटिश पुलिस स्टेशन और चौकियों पर आक्रमण किया।
- गुरिल्ला युद्ध अनियमित युद्ध का एक रूप है जिसमें लड़ाकों के छोटे समूह बड़ी और कम गतिशील पारंपरिक सेना से लड़ने के लिए घात, तोड़फोड़, छापे, छन्द्द युद्ध, मारना और भागना रणनीति सहित सैन्य रणनीतियों का प्रयोग किया जाता है।
- उन्होंने 22 अगस्त 1922 को पहला हमला चिंतापल्ली में किया तथा अपने 300 सैनिकों के साथ शस्त्रों को लूटा। उसके बाद कृष्णदेवीपेट के पुलिस स्टेशन पर हमला किया और विरयया डोरा को मुक्त करवाया।
- अल्लूरी सीताराम राजू को पकड़ने के लिए 10,000 रुपए और उनके लेफ्टिनेंटों गाम गौतम डोरा और गाम मल्लया डोरा पर 1000 रुपए का इनाम घोषित करने के बाद भी अंग्रेजों को आदिवासी प्रतिरोध को दबाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा।
- उसके कुछ समय बाद आदिवासियों पर अंग्रेजों द्वारा हो रहे अत्याचार के कारण सीताराम राजू ने आत्मसमर्पण कर दिया ये सोचकर कि उनके साथ न्याय होगा।
- 7 मई, 1924 को ब्रिटिश सेना ने अल्लूरी सीताराम राजू को पकड़ लिया और मार डाला, जो रम्पा विद्रोह के अंत का प्रतीक था ।
मान्यता और विरासत
- अल्लूरी सीताराम राजू का जीवन जाति और वर्ग के आधार पर बिना भेदभाव के ‘समाज की एकता’ का उदाहरण है।
- उन्हें आंध्र प्रदेश में एक लोकनायक के रूप में सम्मानित किया जाता है।
- प्रत्येक वर्ष आंध्र प्रदेश सरकार उनकी जन्म तिथि को राज्य उत्सव के रूप में मनाती है।
- उन्होंने आदिवासी प्रतिरोध, राष्ट्रवाद और शहादत का प्रतीक माना जाता है।
- अल्लूरी सीताराम राजू नामक जीवनी पर आधारित फिल्म वर्ष 1974 में रिलीज हुई थी।
- भारत सरकार द्वारा वर्ष 1986 में एक डाक टिकट जारी किया गया जिस पर अल्लूरी सीताराम राजू की तस्वीर है।
अल्लूरी राजू ने न केवल इन साहसी हमलों का नेतृत्व किया, बल्कि आदिवासी समुदायों के बीच असहयोग आंदोलन और स्वराज के आदर्शों का प्रसार भी किया। उन्होंने एक निडर क्रांतिकारी के रूप में एक प्रेरणादायक विरासत छोड़ी, वे स्वयं आदिवासी समुदाय से संबंधित न होने के बावजूद आदिवासी लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी।